कुछ वर्षों के ठहराव के बाद रूस-भारत-चीन (RIC) त्रिपक्षीय मंच फिर से सक्रिय होने की दिशा में कदम बढ़ा रहा है। 1990 के दशक के अंत में रूसी राजनेता येवगेनी प्रिमाकोव द्वारा प्रस्तावित यह फॉर्मेट पश्चिमी प्रभुत्व के खिलाफ एक बहुध्रुवीय दृष्टिकोण को बढ़ावा देने के लिए तैयार किया गया था।
- 1998–2020: व्यापार, ऊर्जा, आपदा प्रबंधन जैसे मुद्दों पर 20 से अधिक मंत्रीस्तरीय बैठकें।
- 2007 दिल्ली सुरक्षा सम्मेलन: वैश्विक शासन व क्षेत्रीय सुरक्षा पर विचार-विमर्श का महत्वपूर्ण पड़ाव।
- 2020 का ठहराव: गलवान घाटी की तनातनी और COVID-19 महामारी के कारण RIC की गतिविधियाँ ठप।
वर्तमान में पुनर्जीवन की दिशा
- रूस की स्थिति: उप विदेश मंत्री आंद्रेई रूडेनको ने RIC की अनुपस्थिति को “अनुचित” बताया और इसे BRICS के ढांचे में महत्वपूर्ण बताया।
- चीन का समर्थन: बीजिंग RIC को क्षेत्रीय शांति व स्थिरता के लिए अनिवार्य बताते हुए त्रिपक्षीय सहयोग के लिए उत्सुक।
- भारत की प्रतिक्रिया: विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि बैठक तभी होगी जब समय सभी के लिए “अनुकूल” हो, जिससे सतर्क स्वीकृति का संकेत मिलता है।
अगर इससे विश्लेषण किया जाए तो निम्न बातें सामने आई हुई दिखती है जैसे की-
- बहुध्रुवीय संतुलन: RIC भारत को QUAD व NATO जैसे पश्चिमी गठबंधनों के समक्ष सेल्फ-रिकाइलेशन का प्लेटफ़ॉर्म देता है।
- ऊर्जा विविधीकरण: रूस व चीन के साथ ऊर्जा साझेदारी से भारत की ऊर्जा सुरक्षा मजबूत हो सकती है।
- संवाद का अवसर: चीन के साथ सीधे टकराव से बचते हुए राजनयिक बातचीत की राह।
- चीन का प्रभुत्व: विश्लेषक चेतावनी देते हैं कि चीन की बढ़ती प्रभावशीलता रूस पर हावी हो सकती है, जिससे भारत पीछे रह जाए।
- सीमा विवाद: LAC पर शांति न होने पर RIC में शामिल होने से भारत की स्थिति कमजोर पड़ सकती है।
- पश्चिमी संबंध: RIC में गहराई से जुड़ने से अमेरिका व यूरोपीय संघ के साथ रिश्तों में जटिलता आ सकती है।
भारत की विदेश नीति “मल्टी-अलाइनमेंट” की अवधारणा पर आधारित है, न कि किसी एक ब्लॉक के प्रति प्रतिबद्धता पर। RIC, BRICS, SCO जैसे मंचों के माध्यम से भारत अपनी विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुसार सहयोग चुनता है। RIC का पुनर्जीवन यूरेशिया में भारत के प्रभाव को बढ़ाने का एक तात्कालिक साधन हो सकता है।
RIC पुनर्जीवन सिर्फ एक औपचारिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि भारत की रणनीतिक चुस्ती का परीक्षण है। बहुध्रुवीय दुनिया में भारत को त्रिपक्षीय सहयोग के वादे को भुनाने पर विचार करना होगा, साथ ही जटिलताओं से बचने की रणनीति भी बनानी होगी।
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